Raj Bhasha

 

संसदीय राजभाषा समिति की पृष्ठभूमि

 

महात्मा गांधी ने 1917 में भरूंच में गुजरात शैक्षिक सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में राष्ट्रभाषा कीआवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि भारतीय भाषाओं में केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसेराष्ट्रभाषा के रूंप में अपनाया जा सकता है क्योंकि यह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती हैयह समस्तभारत में आर्थिकधार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूंप में प्रयोग के लिए सक्षम है तथा इसे सारेदेश के लिए सीखना आवश्यक है। संविधान निर्माताओं ने संविधान के निर्माण के समय राजभाषा विषय परविचार-विमर्श किया था और यह निर्णय लिया कि देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूंप मेंअंगीकृत किया जाए  इसी आधार पर संविधान के अनुच्छेद 343(1) में देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ कीराजभाषा घोषित किया गया।  किन्तुसंविधान के निर्माण तथा अंगीकरण के समय यह परिकल्पना की गईथी कि संघ के कार्यकारीन्यायिक और वैधानिक प्रयोजनों के लिए प्रारम्भिक 15 वर्षों तक अर्थात 1965 तकअंग्रेजी का प्रयोग जारी रहे  तथापि यह प्रावधान किया गया था कि उक्त अवधि के दौरान भी राष्ट्रपतिकतिपय विशिष्ट प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग का प्राधिकार दे सकते हैं।

 

2.     परिवर्तन के लिए 15 वर्ष की कालावधि पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद निर्धारित की गई थी ताकि उक्तअन्तराल के बाद निर्बाध भाषाई-परिवर्तन हेतु आवश्यक व्यवस्था तथा तैयारी की जा सके  संविधान के निर्माता इस बातके प्रति जागरूंक थे कि सभी क्षेत्रों में 1965 तक भाषाई परिवर्तन करना सम्भव  होगा  उन्हें यह भी आभासरहा होगा कि सुचारूं परिवर्तन के हित में 15 वर्ष की कालावधि के दौरान भी अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी के क्रमिकप्रयोग की अनुमति दी जानी चाहिए।

 

3.     संविधान के अनुच्छेद 351 में भी संघ की राजभाषा के रूंप में हिंदी के विकास का संकेत दिया गया है संविधान निर्माताओं ने इस भाषा के एक अखिल भारतीय रूंप की कल्पना की थी जो अन्य भारतीय भाषाओं कीसहायता लेकर अहिंदी भाषी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों द्वारा व्यापक रूंप से स्वीकार किए जाने की क्षमता प्राप्त करसके।

 

4.     1963 में राजभाषा अधिनियम अधिनियमित किया गया  अधिनियम में यह व्यवस्था भी थी कि केन्द्रीयसरकार द्वारा राज्यों से पत्राचार में अंग्रेजी के प्रयोग को उसी स्थिति में समाप्त किया जाएगा जबकि सभी अहिंदी भाषीराज्यों के विधान मण्डल इसकी समाप्ति के लिए संकल्प पारित कर दें और उन संकल्पों पर विचार करके संसद केदोनों सदन उसी प्रकार के संकल्प पारित करें। अधिनियम में यह भी व्यवस्था थी कि अन्तराल की अवधि में कुछविशिष्ट प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाए और कुछ अन्य प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी और हिंदी दोनोंका प्रयोग किया जाए। सन् 1976 में राजभाषा नियम बनाए गए।

 

5.     उक्त अधिनियम मेंअन्य बातों के साथ-साथयह भी प्रावधान था कि संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिएहिंदी के प्रयोग में हुई प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए एक राजभाषा समिति गठित की जाए  राजभाषाअधिनियम, 1963 की धारा (3) के प्रख्यापन के दस वर्ष बाद इस समिति का गठन किया जाना था  समितिका गठन अधिनियम की धारा के तहत वर्ष 1976 में किया गया  इस समिति में संसद के 30 सदस्यहोने का प्रावधान है  20 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से  बाद में 1977, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों के पश्चात् समिति कापुनर्गठन हुआ है  समिति के कार्यकलाप और गतिविधियां मुख्यत: राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा में दीगई हैं  सुलभ संदर्भ के लिए राजभाषा अधिनियम की धारा को नीचे उद्धृत किया गया है:

 

"(1)       जिस तारीख को धारा प्रवृत्त होती है उससे दस वर्ष की समाप्ति के पश्चात् राजभाषा के सम्बन्धमें एक समितिइस विषय का संकल्प संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से प्रस्तावितऔर दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने परगठित की जाएगी 

 

(2)        इस समिति में तीस सदस्य होंगेजिनमें 20 लोकसभा के सदस्य होंगे तथा 10 राज्यसभा के सदस्यहोंगेजो क्रमश:  लोकसभा के सदस्यों तथा राज्यसभा के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति केअनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे 

 

(3)        इस समिति का कर्तव्य होगा कि संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग में की गईप्रगति का पुनर्विलोकन करे और उस पर सिफारिशें करते हुए राष्ट्रपति को प्रतिवेदन प्रस्तुत करे  राष्ट्रपतिउस प्रतिवेदन को संसद के हर सदन के समक्ष रखने के लिए आदेश जारी करते हैं और उसे सभी राज्यसरकारों को भिजवाया जाता है 

 

(4)        राष्ट्रपति उपधारा (3) में निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर और उस पर राज्य सरकारों ने यदि कोई मतअभिव्यक्त किए हों तो उस पर विचार करने के पश्चात् उस समस्त प्रतिवेदन या उसके किसी भाग केअनुसार निदेश जारी करते हैं 

 

  परन्तु इस प्रकार निकाले गए निदेश धारा के उपबन्धों से असंगत नहीं होंगे। "

 

6.     समिति के अध्यक्ष का चुनाव समिति के सदस्यों द्वारा किया जाता है। परम्परा के अनुसार केन्द्रीयगृह मंत्री जी को समय समय पर समिति का अध्यक्ष चुना जाता रहा है।

 

7.     अपने प्रेक्षण के आधार पर केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में हिन्दी के प्रयोग से संबंधित स्थिति कीसमीक्षा करते हुए समिति द्वारा अपना प्रतिवेदन सिफारिशों सहित राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता हैताकि केन्द्र सरकार के कार्यालयों को हिन्दी का अधिकतम प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेजिससे संवैधानिक उपबंधों के लक्ष्य प्राप्त हो सकें। वस्तुस्थिति का मूल्यांकन करने के लिए समिति नेअन्य तरीकों के साथ-साथ केन्द्रीय सरकार के विभिन्न कार्यकलापों का निरीक्षण करने का भी निर्णय लियाथा। इस प्रयोजन के लिए समिति ने तीन उप समितियां गठित की और भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों आदि को तीनों उप समितियों द्वारा निरीक्षण के उद्देश्य से तीन समूहों में बांट दिया गया। अब तकइन तीनों उप समितियों ने केन्द्रीय सरकार के कुल 8649 कार्यालयों का निरीक्षण किया है जिनमें विदेशों मेंस्थित कुछ कार्यालय भी शामिल है।

 

8    इसके अतिरिक्त विभिन्न  प्रयोजनों तथा तत्संबंधी अन्य विषयों में राजभाषा के प्रयोगका आकलन करने के उद्देश्य से यह भी निर्णय लिया गया था कि शिक्षाविधि एवं स्वयंसेवीसंगठनोंमंत्रालयों/विभागों के सचिवों आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों से सम्बद्ध गणमान्य व्यिक्तयों कोमौखिक साक्ष्य के लिए आमंत्रित किया जाए। अभी तक विभिन्न क्षेत्रों के लगभग 826गण्यमान्य व्यिक्त समिति के सम्मुख साक्ष्य देने के लिए उपस्थित हो चुके हैं।

 

9     समिति द्वारा केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में हिन्दी के प्रगामी प्रयोग की समीक्षाराजभाषा से सम्बन्धित संवैधानिक उपबन्धोंराजभाषा अधिनियम, 1963 और उसके अन्तर्गतबनाए गए नियमों की पृष्ठभूमि में की जा रही है। सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किएगए तत्सम्बन्धी परिपत्रों/अनुदेशों आदि को तो समिति ध्यान में रखती ही है साथ हीचूंकिसमिति के विचारार्थ विषयों का क्षेत्र बहुत व्यापक हैइसलिए वह विद्यालयोंमहाविद्यालयोंऔर विश्वविद्यालयों में शिक्षा का माध्यमकेन्द्रीय सरकारी सेवाओं में भर्ती की विधिकेन्द्रीयसरकार के कर्मचारियों का सेवाकालीन प्रशिक्षण और विभागीय परीक्षाओं का माध्यम आदि जैसेअन्य संगत पहलुओं की भी जांच करती रही है। राजभाषा नीति की व्यापकता के विभिन्नपहलुओं को देखते हुए तथा वर्तमान परिस्थितियों को सामने रखते हुए समिति ने जून, 1985और अगस्त, 1986 में हुई अपनी बैठकों में निर्णय लिया था कि राष्ट्रपति को एक प्रतिवेदनदेने के बजाए उसे विभिन्न खंडों में प्रस्तुत किया जाए। प्रत्येक खंड राजभाषा नीति के पहलूविशेष के संबंध में हो।

 

10.    समिति ने यह भी निर्णय लिया कि अपने प्रतिवेदन के पहले खण्ड में केन्द्रीय सरकारके कार्यालयों के लिए अनुवाद व्यवस्था और उसके विभिन्न पहलुओं की जांच की जाए औरआवश्यक सिफारिशें की जाएं। तदनुसारसमिति ने जनवरी, 87 में राष्ट्रपति जी को अपनेप्रतिवेदन का पहला खण्ड प्रस्तुत किया जो केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में अनुवाद व्यवस्था सेसम्बन्धित है। संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखे जाने तथा राज्य सरकारों को भेजे जानेके पश्चात सरकार द्वारा इस खण्ड में की गई सिफारिशों पर आवश्यक कार्रवाई की गई है। इससंबंध में 30 दिसम्बर, 1988 राष्ट्रपति जी का आदेश राजभाषा विभाग द्वारा जारी कर दियागया है।

 

11.     केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में यांत्रिक सुविधाओं में हिन्दी तथा अंग्रेजी के प्रयोगसे सम्बन्धित प्रतिवेदन का दूसरा खण्ड राष्ट्रपति जी को जुलाई, 87 में प्रस्तुत कर दिया गया।यह प्रतिवेदन संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जा चुका है और इसमें की गई सिफारिशोंके संबंध में सरकार द्वारा आवश्यक कार्रवाई की गई है। इस सम्बन्ध में भी 29 मार्च, 1990 को राष्ट्रपति जी का आदेश राजभाषा विभाग द्वारा जारी कर दिया गया है।

 

12.     केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के हिन्दी शिक्षण और उनके हिन्दी माध्यम से प्रशिक्षण आदि से सम्बन्धितव्यवस्थाओं के बारे में समिति के प्रतिवेदन का तीसरा खण्ड फरवरी, 89 में राष्ट्रपति जी को प्रस्तुत किया गया। इससंबंध में 04 नवम्बर, 1991 को राष्ट्रपति जी का आदेश राजभाषा विभाग द्वारा जारी कर दिया गया है।

 

13.     समिति की तीनों उप समितियों द्वारा जुलाई, 89 तक किए गए निरीक्षणों के आधार पर देश केविभिन्न भागों में सरकारी कार्यालयों और उपक्रमों आदि में हिन्दी के प्रयोग की स्थिति से सम्बन्धित चौथा खंड राष्ट्रपतिजी को नवम्बर, 89 में प्रस्तुत किया गया। इस संबंध में 28 जनवरी, 1992 को राष्ट्रपति जी का आदेशराजभाषा विभाग द्वारा जारी कर दिया गया है।

 

14.     समिति द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन का पांचवां खंड विधायन की भाषा और विभिन्न न्यायालयों तथान्यायाधिकरणों आदि में प्रयोग की जाने वाली भाषा से सम्बन्धित है। उक्त खंड राष्ट्रपति जी को मार्च, 92 में प्रस्तुतकिया गया है। इस पर 24 नवम्बर, 1998 को महामहिम राष्ट्रपति जी के आदेश जारी हो चुके हैं।

 

15.     संसदीय राजभाषा समिति के प्रतिवेदन का छठा खंड समिति द्वारा 27.11.97 को राष्ट्रपति जी कोप्रस्तुत किया गया है। यह खंड संघ सरकार के कार्यालयों में हिन्दी के प्रयोगसंघ तथा राज्य सरकारों के बीच औरसंघ तथा संघ राज्य क्षेत्रों के बीच पत्राचार में हिन्दी के प्रयोग और राज्यों  संघ राज्य क्षेत्रों के बीच परस्पर पत्र-व्यवहार में उनकी राजभाषाओं के प्रयोग से संबंधित है। इसके अतिरिक्तइसमें विदेशों में स्थित केन्द्र सरकार केकार्यालयों में हिन्दी के प्रयोग के बारे में भी समीक्षा की गई है। इस पर 17 सितम्बर, 2004 को राष्ट्रपति जीके आदेश भी जारी हो चुके हैं।

 

16.     संसदीय राजभाषा समिति के प्रतिवेदन  का सातवां खण्ड मई, 2002 को राष्ट्रपति जी को प्रस्तुतकिया गया। इस खण्ड में समिति ने सरकारी काम-काज मे मूल रूंप से हिन्दी में लेखन कार्यविधि संबंधीकार्यों में राजभाषा हिन्दी की स्थितिसरकारी कामकाज मे राजभाषा के प्रयोग हेतु प्रचार-प्रसारप्रशासनिकऔर वित्तीय कार्यों से जुड़े प्रकाशनों की हिन्दी में उपलब्धताराज्यों मे राजभाषा हिन्दी की स्थिति,वैश्वीकरण और हिन्दीकम्प्यूटरीकरण एक चुनौती इत्यादि विषयों को समाहित कर संघ सरकार में हिन्दीके प्रयोग की वर्तमान स्थिति के संबंध में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की। इस पर 13 जुलाई, 2005 को राष्ट्रपतिजी के आदेश जारी हो चुके हैं।

 

17.    दिनांक 16 अगस्त, 2005 को संसदीय राजभाषा समिति ने महामहिम राष्ट्रपति जी को समिति केप्रतिवेदन का आठवां खण्ड समर्पित किया। समिति द्वारा समर्पित प्रतिवेदन के आठवें खण्ड मे चार भाग हैं।पहले भाग में समिति के गठन एवं कार्यकलापों पर प्रकाश डालते हुए पिछले सात खण्डों पर की गई कार्रवाईतथा आठवें खण्ड की रूंपरेखा को दर्शाया गया है। प्रतिवेदन के दूसरे भाग में समिति द्वारा 01 जनवरी, 2002से 31 मार्च, 2005 तक किए गए निरीक्षणों आदि के आधार पर प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण किया गया है।राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) राजभाषा अधिनियम 1976 के नियम 5( हिन्दी में पत्राचारप्रकाशन,कोड-मैनुअल एवं प्रशिक्षण इत्यादि से संबंधित राष्ट्रपति जी के आदेशों के अनुपालन की स्थिति का मंत्रालयएवं क्षेत्रवार मूल्यांकन किया गया है। इसके अलावा विभिन्न नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों के साथविचार-विमर्श का सार भी प्रस्तुत किया गया है। प्रतिवेदन के तीसरे एवं महत्वपूर्ण भाग में समिति नेकेन्द्रीय कार्यालयोंपुस्तकों की खरीदकम्प्यूटरीकरणभर्ती नियमों में हिन्दी ज्ञान की अनिवार्यताहिन्दीपदों की स्थितिशिक्षण और प्रशिक्षण संस्थानों मे हिन्दी माध्यम की उपलब्धताहिन्दी विज्ञापनों पर व्ययतथा सार्वजनिक उपक्रमों के वाणिज्यिक कार्यों मे हिन्दी के प्रयोग जैसे विषयों पर अपने अनुभवों के आधारपर समीक्षा प्रस्तुत की है। तीनों भागों में शामिल किए गए विभिन्न अध्यायों के निष्कर्षों के आधार परसमिति ने प्रतिवेदन के चौथे भाग में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की हैं।

 

18.    समिति सचिवालय जो 11 तीन मूर्ति मार्गनई दिल्ली में स्थित है एक बहुत छोटा कार्यालय हैजिसकी प्रधान समिति की सचिव हैं और उनकी सहायता के लिए तीन अवर सचिव एवं अन्य कार्मिक हैं ये सभी समिति के विभिन्न कार्यकलापों में अपेक्षित सहयोग प्रदान करते हैं। यह सचिवालय प्रशासनिकप्रयोजनों की दृष्टि से राजभाषा विभागगृह मंत्रालय के अधीन आता है 

 
 
     

राजभाषा संकल्प, 1968

 

संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित निम्नलिखित सरकारी संकल्प आम जानकारी के लिए प्रकाशित किया जाता है -

 

संकल्प

 

जबक संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी रहेगी और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिंदी  भाषा का प्रसारवृद्धि करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति  के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सकेसंघ का कर्तव्य है : 

 

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के प्रसार एंव विकास की गति बढ़ाने के हेतु तथा संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा और किए जाने वाले उपायों एवं की जाने वाली प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट संसद की दोनों सभाओं के पटल पर रखी जाएगी और सब राज्य सरकारों को भेजी जाएगी ।

 

2.   जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त भारत की 21 मुख्य भाषाओं का उल्लेख किया गया है , और देश की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास हेतु सामूहिक उपाए किए जाने चाहिए :  

  

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के साथ-साथ इन सब भाषाओं के समन्वित विकास हेतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हो और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बनें ।

 

3.   जबकि एकता की भावना के संवर्धन तथा देश के विभिन्न भागों में जनता में संचार की सुविधा हेतु यह आवश्यक है कि भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के परामर्श से तैयार किए गए त्रि-भाषा सूत्र को सभी राज्यों में पूर्णत कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी किया जाना चाहिए :

 

यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी तथा अंग्रेजी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा केदक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को तरजीह देते हुएऔर अहिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी के अध्ययन के लिए उस सूत्र के अनुसार प्रबन्ध किया जाना चाहिए ।

 

4. और जबकि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संघ की लोक सेवाओं के विषय में देश के विभिन्न भागों के लोगों के न्यायोचित दावों और हितों का  पूर्ण परित्राण किया जाए

 

यह सभा संकल्प करती है कि-

 

            (क)  कि उन विशेष सेवाओं अथवा पदों को छोड़कर जिनके लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के कर्त्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेजी अथवा केवल हिंदी अथवा दोनों जैसी कि स्थिति होका उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाएसंघ सेवाओं अथवा पदों के लिए भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिंदी अथवा अंग्रेजी में से किसी एक का ज्ञान अनिवार्यत होगाऔर

 

            (ख)  कि परीक्षाओं की भावी योजनाप्रक्रिया संबंधी पहलुओं एवं समय के विषय में संघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात अखिल भारतीय एवं उच्चतर केन्द्रीय  सेवाओं संबंधी परीक्षाओं के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखने की अनुमति होगी ।